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قُبلة!


و تخيَّل لو قبّلتُكَ سراً..

ثم همستُ إليك:

لا تخبرْ أحداً..

هل تعجبكَ القصة؟!

و تخيَّل لو أنكَ تمضي بقبلتكَ كلعنة..

لا تنام..

لا تأكل..

لا تشرب..

تتلمسُ صوتَ القبلة

و ذاتَ قصيدة عند تمامِ ( الغدر).. تركتكْ...

ما تفعل؟!

و قد أصبحتَ ( رهينَ) القبلة!

و تسألني:

لمَ تكتبين عن الحب، أعاشقةٌ أنت؟!

هل تعلم أني قبّلتُ " الوطنَ" سراً..

هل تعلم أنَّ الوطنَ ( رهينُ) قُبَلٍ شتى..

و أنّ ( الغدرَ) ليس من شيم المشتاق.


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